यक्ष, राक्षसों, असुरों, पितरों, सर्प, किन्नरों और किम्पपुरुषों की उत्पत्ति
ब्रह्मांड के गर्भरूपी जल में निवास करने वाले श्री भगवान ने ब्रह्माजी के अंत:करण में प्रवेश किया और ब्रह्मजी भगवान के पूर्व कल्पों में निश्चित की हुई नामरूपी व्यवस्था के अनुसार लोकों की रचना करने लगे।
सबसे पहले उन्होंने अपनी छाया से तमिस्त्र, अंधतमिस्र, तम, मोह और महामोह – ये पाँच प्रकार की अविद्या उत्पन्न की परंतु ब्रह्माजी को अपना वह तमोमय शरीर अच्छा नहीं लगा और उन्होंने उसे त्याग दिया। तब रात्रि रूपी उस शरीर से जिससे भूख और प्यास की उत्पत्ति होती है, यक्ष और राक्षस उत्पन्न हुए । भूख और प्यास से व्याकुल होकर वे ब्रह्मा जी और उन्हें खाने को दौड़ पड़े। ब्रह्मा जी ने कहा ” अरे तुम मेरी संतान हो, मेरा भक्षण मत करो, मेरी रक्षा करो’ परंतु ब्रह्मा जी की बात का उन पर कोई असर नहीं हुआ और वो कहने लगे “इसकी रक्षा मत करो, इसको खा जाओ”। उनमे से जिन्होंने कहा ‘खा जाओ’ वे यक्ष हुए और जिन्होंने कहा ‘ रक्षा मत करो’ वे राक्षस कहलाये।
इसके पश्चात् ब्रह्मा जी के जघनदेश से कामस्कत असुर उत्पन्न हुए । ब्रह्माजी ने कामातुर असुरों को देख कर अपना वह काम कलुषित शरीर भी त्याग दिया जिससे एक सुंदर स्त्री संध्यादेवी उत्पन्न हुई। उसको असुरों ने ग्रहण किया। ब्रह्मा जी के त्यागे हुए कामास्कत शरीर से कोहरा भी उत्पन्न हुआ।
तदनंतर ब्रह्मा जी ने गम्भीर भाव से हँसकर अपनी कांतिमय मूर्ति से, जो अपने सौंदर्य का स्वम ही आस्वादन करती थी, गंधर्व और अप्सराओं को उत्पन्न किया । ब्रह्माजी के त्यागे हुए ज्योतिर्मय कांतिमय शरीर को गंधर्वों ने ग्रहण किया।
इसके पश्चात ब्रह्माजी की तंद्रा से भूत- पिशाच को उत्पन्न हुए। उन्हें दिगम्बर और अव्यसत देख कर उन्होंने आँखें मूँद ली । ब्रह्मा जी के त्यागे हुए उस जँभाईरूप शरीर को भूत और पिशाचों ने ग्रहण किया। इस को निद्रा भी कहते हैं, जिससे जीवों की इंद्रियों में शिथिलता आती है।
तत्पश्चात ब्रह्मा जी ने भावना की कि मैं तेजोमय हूँ और अपने तेज़ से साध्यगण और पित्रगण को उत्पन्न किया । पितरों ने अपनी उत्पत्ति के स्थान उस अदृश्य शरीर को ग्रहण किया । इसी को ध्यान में रख कर पितरों को श्राद्ध आदि के द्वारा क्रमशः कव्य ( पिण्ड) और हव्य अपर्ण करते हैं।
अपनी तिरोधन शक्ति से ब्रह्माजी ने सिद्ध और विद्याधरों की उत्पत्ति की और उन्हें अपना अंतरध्यान नाम का अद्भुत शरीर दिया। ब्रह्मा जी ने अपने प्रतिबिम्बित की सुंदरता से किन्नर और किम्पपुरुष उत्पन्न किया।
एक बार ब्रह्मा जी सृष्टि की वृद्धि ना होने के कारण चिंतित हो कर लेट गए और क्रोधवश उस भोगमय शरीर को छोड़ दिया। उनसे जो बाल झड़ कर गिरे, वे अहि हुए तथा उनके हाथ पैर सिकोड़ कर चलने से सर्प और नाग उत्पन्न हुए।
तदांतर उन्होंने अपने मन से मनुओं को उत्पन्न किया और फिर अपने तप, योग, समाधि, से सम्पन्न होकर अपनी प्रिय संतान ऋषि गण की रचना की और उनमें से प्रत्येक की अपने समाधि, योग, ऐश्वर्य, तप, विद्या और वैरागमय शरीर का अंश दिया।
एक बार उन्होंने विश्वविस्तार का विचार किया । वे मन ही मन चिंता करने लगे की मारिचि आदि महान शक्तिशाली ऋषि भी सृष्टि का अधिक विस्तार नहीं कर पाए और मेरे निरंतर प्रयास करने पर भी प्रजा की यथोचित वृद्धि नहीं हो रही है। उसी समय उनके शरीर के दो भाग हो गए। ‘क’ ब्रह्मा जी का नाम है, उसी से विभक्त होने के कारण शरीर को काय कहते हैं।
उन दोनो विभागों से एक स्त्री पुरुष का जोड़ा उत्पन्न हुआ। उनमे से जो पुरुष था वो सार्वभौम सम्राट मनु हुए और जो स्त्री थी वह उनकी महारानी शतरूपा हुए। तब से मिथुन धर्म (स्त्री -पुरुष के संसर्ग) से प्रजा की वृद्धि होने लगी। उससे पहले देवता अपने विचारों और अँगो से ही संतान की उत्पत्ति करते थे।
।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय:।।
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