विराट शरीर की उत्पत्ति तथा विराट शरीर से वर्णों की उत्पत्ति। क्या शूद्र वर्ण को हिन्दू धर्म तुच्छ मानता है?
सर्वशक्तिमान भगवान ने जब देखा की आपस में संगठित ना होने कारण मेरी महत्व आदि शक्तियाँ विश्व रचना में असमर्थ हो रही हैं तब उन्होंने कालशक्ति को स्वीकार कर के एक साथ ही महत्त्व, अहंकार, पंचभूत, पाँच तन्मात्रा और मन सहित ग्यारह इंद्रियाँ – इन तेइस तत्वों के समुदाय में प्रविष्ट हो गए और उस तत्व समूह को अपनी क्रिया शक्ति के द्वारा आपस में मिला दिया।
तब उन तेइस तत्वों के समूह ने भगवान के प्रेरणा से अंशों द्वारा अधि पुरुष – विराट को उत्पन्न किया। जल के भीतर जो अंडरूप आश्रय स्थान था, उसके भीतर वह विराट पुरुष सम्पूर्ण जीवों को ले कर एक हज़ार दिव्य वर्षों तक रहा। वह विश्व रचना करने वाले तत्त्वों का गर्भ था तथा ज्ञान क्रिया और आत्मविश्वास से सम्पन्न था । इन शक्तियों से उसने क्रमशः एक हृदय रूप, दस प्राण रूप और तीन आध्यात्मिक, अधिदैविक और आधिभौतिक विभाग किए। यह विराट पुरुष ही प्रथम जीव होने के कारण परमात्मा का अंश और प्रथम अभिव्यक्त होने के कारण भगवान का आदि अवतार है।
फिर विश्व की रचना करने वाले श्री भगवान ने अपने चेतन रूप तेज़ से उस विराट पुरुष को प्रकाशित किया। पहले विराट पुरुष का मुख प्रकट हुआ उसमें लोकपाल अग्नि अपने अंश वागिइन्द्रिय के समेत प्रवेश किया। फिर विराट पुरुष के तालु उत्पन्न हुआ उसमें लोकपाल वरुण अपने अंश रसनेंद्रिय सहित स्थित हुए। इसके पश्चात विराट पुरुष के नथुने प्रकट हुए उनमे दोनो अश्विनी कुमार अपने अंश घानेंद्रियाँ के साथ प्रविष्ट हुए । इसी प्रकार आँखें प्रकट हुई जिनमे अपने अंश नेत्रइंद्रियों के साथ लोकपति सूर्यदेव ने प्रवेश किया। फिर उस विराट विग्रह में त्वचा उत्पन्न हुई जिसमें अपने अंश तविगइंद्रियों के साथ वायु ने स्थित हुआ। इसके बाद कर्ण छिद्र उत्पन्न हुए जिसमें श्रवण इंद्रियों सहित दिशाओं ने प्रवेश किया। उसके पश्चात चर्म उत्पन्न हुआ जिसमें अपने अंश रोम के सहित औषधि ने प्रवेश किया। फिर लिंग और गुदा उत्पन्न हुए जिसमें प्रजापति ने अपने अंश वीर्य और लोकपाल मित्र ने पायु-इन्द्रिय के साथ प्रवेश किया। इसके पश्चात हाथ प्रकट हुए जिसमें शक्ति के साथ देवरूप इंद्र ने प्रवेश किया। फिर चरण उत्पन्न हुए जिनमें शक्ति गति के साथ लोकेश्वर विष्णु ने प्रवेश किया। फिर बुद्धि उत्पन्न हुई जिनमें बुद्धि शक्ति सहित वाक्पति ब्रह्मा ने प्रवेश किया। इसी प्रकार मन उत्पन्न हुआ जिसके चंद्रमा अपने अंश मन के स्थापित हुआ। तत्पश्चात विराट पुरुष में अहंकार उत्पन्न हुआ जिसमें क्रिया शक्ति सहित अभिमान(रूद्र) ने प्रवेश किया इसके बाद चित्त उत्पन्न हुआ जिसमें चित्त शक्ति के साथ महतत्तव उत्पन्न हुआ ।
इस प्रकार सर्वगुण सम्पन्न विराट पुरुष की उत्पत्ति के पश्चात उस विराट पुरुष के शरीर के अंगों से वर्णव्ययस्था का प्रारम्भ हुआ, सर्वप्रथम विराट पुरुष के मुख से मोक्ष प्राप्ति की ओर ले जाने वाला ब्राह्मण वर्ण उत्पन्न हुआ । भुजाओं से सब धर्मों की रक्षा करने वाला क्षत्रिय वर्ण उत्पन्न हुआ। विराट पुरुष की दोनो जाँघों से अपनी वृत्ति से सब वर्णों की जीविका चलाने वाला वैश्य वर्ण उत्पन्न हुआ और फिर सब धर्मों की सिद्धि के लिए विराट पुरुष के चरणों से सेवावृति प्रकट हुई और उन्ही से शूद्र वर्ण भी प्रकट हुआ जिसकी केवल वृत्ति से ही भगवान श्रीहरी प्रसन्न हो जाते हैं:
पदभ्यं भगवतो जज्ञे सुश्रुषा धर्मसिध्ये।
तस्यं ज़ात: पुरा शुद्रों यद्व्र्त्त्या तुष्याते हरि:।।
(श्रीमद् भागवत महापुराण, तीसरा स्कंध, छठा अध्याय, श्लोक ३३)
सब धर्मों की सिद्धि का मूल सिर्फ़ सेवा है, सेवा किए बिना कोई भी धर्म सिद्ध नहीं होता। अत: सब धर्मों की मूलभूत सेवा ही जिसका धर्म है वह शूद्र वर्णों में महान है । ब्राह्मण का धर्म मोक्ष के लिए है, क्षत्रिय का धर्म भोगने के लिए, वैश्य का धर्म अर्थ के लिए है और शूद्र का धर्म- धर्म के लिए है । इस प्रकार प्रथम तीन वर्णों धर्म अन्य पुरुषार्थ लिए हैं, किंतु शूद्र का धर्म सवपुरुषार्थ के लिए है; अत: इसकी वृत्ति से ही भगवान प्रसन्न हो जाते हैं।
उपरोक्त से स्पष्ट है कि हिन्दू धर्म में शूद्र वर्ण को तुच्छ नहीं समझा जाता अपितु शूद्र वर्ण को अन्य वर्णों से श्रेष्ठ समझा जाता है क्यूँकि इस वर्ण की वृत्ति मात्र से ही श्रीहरी प्रसन्न हो जाते हैं। सामाजिक कुरीतियों के कारण शूद्र वर्ण को तुच्छ मान कर भेदभाव किया जाता है परन्तु हमारे पुराण, हमारा धर्म इसका समर्थन नहीं करता।
यदि सब जीवों में परमात्मा का अंश के परिप्रेक्ष्य से भी इस बात का विश्लेषण किया जाए तब भी हिन्दू धर्म, त्वचा के रंग, वर्ण या अन्य किसी भी प्रकार की सामाजिक तुलनात्मक विषयों से मनुष्यों में भेदभाव नहीं करता। हिन्दू धर्म में हर जीव में साक्षात् भगवान ही अपने अंश रूप में विद्यमान है और हर मनुष्य उसी परम पिता परमात्मा का रूप है।
।। ॐ नमो भगवते वसुदेवाय:।।
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