श्रीमद वाल्मीकि रामायण में वर्णित बालि, सुग्रीव अंगद, श्री हनुमान इत्यादि वानर अर्थात बन्दर थे अथवा वन अर्थात जंगल में रहने वाले आदिवासी थे?
यह एक नई भ्रान्ति समाज में व्याप्त है। कुछ बुद्धिमान व्यक्तियों का मत है की यह सब वन+नर अर्थात वन में वास करने वाले नर थे अतः इनका बन्दर प्रजाति से कोई सम्बन्ध नहीं है। इससे जुड़े अनेकों लेख आप भिन्न भिन्न वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं जिनमे तर्कों और वाल्मीकि रामायण के कुछ श्लोकों का उदाहरण दे कर यह प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है की
“वानर शब्द का अर्थ होता हैं वन में उत्पन्न होने वाले अन्न को ग्रहण करने वाला। जैसे पर्वत अर्थात गिरि में रहने वाले और वहाँ का अन्न ग्रहण करने वाले को गिरिजन कहते हैं उसी प्रकार वन में रहने वाले को वानर कहते हैं। वानर शब्द से किसी योनि विशेष, जाति , प्रजाति अथवा उपजाति का बोध नहीं होता।”
“सुग्रीव, बालि आदि का जो चित्र हम देखते हैं उसमें उनकी पूंछ दिखाई देती हैं, परन्तु उनकी स्त्रियों के कोई पूंछ नहीं होती? नर-मादा का ऐसा भेद संसार में किसी भी वर्ग में देखने को नहीं मिलता। इसलिए यह स्पष्ट होता हैं की हनुमान आदि के पूंछ होना केवल एक चित्रकार की कल्पना मात्र हैं।”
इनके विचार पढ़ कर यह बोध होता है की जितनी भी श्री हनुमान की मूर्तियां विश्व भर में उपलब्ध है और जिनकी पूजा अर्चना की जाती है – वह केवल कल्पना मात्र है। परन्तु यह सभी सुयोग्य पुरुष रामायण काल की तुलना वर्त्तमान समय से करते हैं और इन यही इन सभी भ्रांतियों की जड़ है?
श्री राम अवतार में श्री भगवान को वानरों से बहुत सहायता मिली थी, इस कारण प्रथम यह जाने का विषय है की वह वानर कौन थे। श्रीमद वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के १७वे सर्ग में लिखा है:
पुत्रत्वं तु गते विष्णौ राज्ञस्तस्य महात्मनः।
उवाच देवताः सर्वाः स्वयम्भूर्भगवानिदम् ।।
सत्यसन्धस्य वीरस्य सर्वेषां नो हितैषिणः ।
विष्णोः सहायान् बलिनः सृजध्वं कामरूपिणः।।
महाराजा दशरथ के पुत्र रूप में भगवान् विष्णु के उत्पन्न होने के अनन्तर ब्रह्माजी ने देवताओं से कहा कि आप सभी भगवान की सहायता के लिये अपने अपने तेज से बलवान् इच्छाधारी जीवों को उत्पन्न करें। इस प्रकार से ब्रह्माजी की आज्ञा पाकर देवताओं ने होने अपने अपने तेज से गन्धर्वी, यक्षी, विद्याधरी, वानरी आदि स्त्रियों में वानर रूप धारी अनेक पुत्रों को उत्पन्न किया। इन्द्र ने बालि को सूर्य ने सुग्रीव को, कुबेर ने गन्धमादन को, विश्वकर्मा ने नल-नील को, पवनदेव ने श्री हनुमान इत्यादि को उत्पन्न किया। क्योंकि रावण को यह वर मिला हुआ था कि उसकी मृत्यु देवताओं इत्यादि किसी के हाथ से नहीं हो सकती केवल मनुष्य तथा वानर के हाथों ही हो सकती है , इसलिये श्री विष्णु को नर – अर्थात मनुष्य रूप तथा अन्य देवताओं को वानर का, रूप धारण करना पड़ा था। वह सभी वानर देव गुणों से संपन्न इच्छाधारी थे, इसलिए आवश्यकता अनुसार रूप धारण कर सकते थे।
श्रीमद वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड के सर्ग १३७-१३८ में कहा गया है :
ते कृत्वा मानुषं रूपं वानराः कामरूपिणः ।
कुशलं पर्यपृच्छंस्ते प्रहृष्टा भरतं तदा ।।
नवनागसहस्राणि ययुरास्थाय वानराः ।।
मानुषं विग्रहं कृत्वा सर्वाभरणभूषिताः ।
इच्छाधारी वानरों ने मनुष्य रूप धारण करके भरतजी से कुशल पूछा । अनेक भूषणों से भूषित वानरगण मनुष्यरूप धारण करके नौ हजार हाथियों पर चढ़ कर चले।
अब प्रश्न यह है की वानर स्वयं मनुष्य ही थे तो उन्हें मनुष्य रूप धारण करने की क्या आवश्यता थी ?? और श्री वाल्मीकि जी को यह वर्णन करने की क्या आवश्यकता की वानरों ने मनुष्य रूप धारण किया ? केवल यह कह सकते थे की वानरों ने अनेक भूषणो से भूषित होकर भरत जी से कुशल क्षेम पूछा।
श्रीमद वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड के द्वितीय सर्ग में श्री हनुमान जी के लिये लिखा है:
सूर्ये चास्तं गते रात्रौ देहँ संक्षिप्य मारुतिः ।
वृषदंशकमात्रोऽथ बभूवाद्भुतदर्शनः ।।
सूर्यास्त होनेके बाद हनुमानजी ने अपने शरीर को छोटा बना कर बिल्ली का रूप धारण किया और उसी अपूर्वं रूप में रावणके अन्तःपुर में घुस गये ।
यही सब देवता स्वरूप वानरों के इच्छाधारी होनेके प्रमाण है। सुंदरकांड के ही एकपंचाश्च: सर्ग में हनुमान जी ने स्वयं रावण से कहा है:
सत्यं राक्षसराजेन्द्रस्य श्रुणुश्व वचनं मम।
रामदासस्य दूतस्य वानरस्य विशेषतः ।।
राक्षसों के राजाधिराज ! मैं भगवान् श्री राम का दास, उनका दूत हूँ और विशेषतः वानर हूँ।
सुंदरकांड में अनेकों श्लोकों में यह भी वर्णित है की श्री हनुमान ने जोर से गर्जना करते हुए अपनी पूँछ फटकारी। और यदि यह कहा जाये की श्री हनुमान जी को पूँछ नहीं थी तो रावण ने यह क्यों कहा की :
कपीनां किल लांगूलमिष्टं भवति भूषणम।
तदस्य दीप्यतां शीघ्रं तेन दग्धेन गच्छतु ।।
वानरों को अपनी पूँछ अत्यन्त प्यारी होती है, वही इनका आभूषण है। अतः जितना जल्दी हो सके इसकी पूँछ को जला दो। जली पूँछ लेकर ही यह यहाँ से जाये। और यदि पूँछ ही नहीं थी तो लंका का विध्वंस कैसे हुआ ??
अब प्रश्न यह है की वानर यदि बन्दर थे तो इतने बुद्धिमान कैसे थे क्योकि चतुर पुरुष यह साबित करने के लिए की वानर का अर्थ बन्दर नहीं होता श्रीमद वाल्मीकि रामायण के निम्न श्लोकों का उदाहरण देते है:
“किष्किन्धा कांड (3/28-32) में जब श्री रामचंद्र जी महाराज की पहली बार ऋष्यमूक पर्वत पर हनुमान से भेंट हुई तब दोनों में परस्पर बातचीत के पश्चात रामचंद्र जी लक्ष्मण से बोले
न अन् ऋग्वेद विनीतस्य न अ यजुर्वेद धारिणः |
न असाम वेद विदुषः शक्यम् एवम् विभाषितुम् || ४-३-२८
“ऋग्वेद के अध्ययन से अनभिज्ञ और यजुर्वेद का जिसको बोध नहीं हैं तथा जिसने सामवेद का अध्ययन नहीं किया है, वह व्यक्ति इस प्रकार परिष्कृत बातें नहीं कर सकता। निश्चय ही इन्होनें सम्पूर्ण व्याकरण का अनेक बार अभ्यास किया हैं, क्यूंकि इतने समय तक बोलने में इन्होनें किसी भी अशुद्ध शब्द का उच्चारण नहीं किया हैं। संस्कार संपन्न, शास्त्रीय पद्यति से उच्चारण की हुई इनकी वाणी ह्रदय को हर्षित कर देती हैं”।
सुंदर कांड (30/18,20) में जब हनुमान अशोक वाटिका में राक्षसियों के बीच में बैठी हुई सीता को अपना परिचय देने से पहले हनुमान जी सोचते हैं
“यदि द्विजाति (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य) के समान परिमार्जित संस्कृत भाषा का प्रयोग करूँगा तो सीता मुझे रावण समझकर भय से संत्रस्त हो जाएगी। मेरे इस वनवासी रूप को देखकर तथा नागरिक संस्कृत को सुनकर पहले ही राक्षसों से डरी हुई यह सीता और भयभीत हो जाएगी। मुझको कामरूपी रावण समझकर भयातुर विशालाक्षी सीता कोलाहल आरंभ कर देगी। इसलिए मैं सामान्य नागरिक के समान परिमार्जित भाषा का प्रयोग करूँगा।”
अतः यह शंका भी समाधान करने योग्य है। पहले ही कहा गया है की श्री राम अवतार के कार्य में सहायता करने के लिये देवों के अंश से वानरों का जन्म हुआ था इसलिए वानरों का सर्वगुण संपन्न होना, समस्त वेदों का ज्ञान होना, सुसंस्कृत देव भाषा का प्रयोग करना इत्यादि में कोई संदेह नहीं होना चाहिए। और इससे कदापि यह प्रमाणित नहीं होता की श्रीमद वाल्मीकि रामायण वर्णित वानर – बन्दर प्रजाति के नहीं थे।
उपयुक्त सभी दृष्टव्यों से तथा श्रीमद वाल्मीकि रामायण के उचित अध्यन्न से यही प्रमाणित होता है की श्रीमद वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानर – बन्दर प्रजाति के ही थे तथा श्री राम अवतार की पूर्णता तथा रावण को प्राप्त वरदान के कारण ही सभी देवों ने वानर अर्थात बन्दर प्रजाति में जन्म लिया था। श्री राम के अपने धाम चले जाने के बाद श्री हनुमान जी को छोड़ कर यह सभी वानर श्री राम के साथ उनके साथ वैकुण्ठ को चले गए।
।।ॐ नमो भगवते वासुदेवाय:।।
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