Shri Krishna
वसुदेव सुतं देवं, कंस चाणूर मर्धनं,
देवकी परमानन्दं, कृष्णं वन्दे जगत गुरुं॥
श्रीकृष्ण: शरण: मम
नन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ ॥9.22॥
जो लोग अभेद दृष्टि से मेरा चिंतन करते हुए, सब ओर मेरी ही उपासना करते हैं, निरंतर आदरपूर्वक ध्यान में लगे हुए उन पुरुषों के योग क्षेम का मैं निर्वाह करता हूँ। (भगवत्स्वरूप की प्राप्ति का नाम ‘योग’ है और भगवत्प्राप्ति के निमित्त किए हुए साधन की रक्षा का नाम ‘क्षेम’ है)
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय: